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तीर्थंकर नामकर्म का बंध

तीर्थंकर नामकर्म के बंध हेतु जो जो कारण शास्त्रों में वर्णित है, उसमें से बहुत-से कारण तीर्थयात्रा में सहज रूप से प्राप्त होते हैं। अतः विधिपूर्वक तीर्थयात्रा का आयोजन करने वाले व तीर्थयात्रा में जुड़ने वाले पुण्यात्माओं को तीर्थंकर नामकर्म का बंध हो उसमें कोई आश्चर्य नहीं। तीर्थंकर नामकर्म के बंध हेतु एक भी उपाय के सेवन से यदि तीर्थंकर नामकर्म का बंध होता हो तो जहाँ एक साथ इतने सारे उपायों का आसेवन नित्य होता हो वहाँ तीर्थंकर नामकर्म का बंध निश्चित हो सकता है। तीर्थंकर की भक्ति से भक्त स्वयं तीर्थंकर बन जाता है। यहीं जिनशासन की मौलिक विशेषता है। यहाँ दोषों का त्याग कर गुणसंपन्न बनने वाले आत्मा के लिये सर्वोच्च पदवी याने तीर्थंकर पदवी सुरक्षित है। तीर्थयात्रा का आयोजन करने वाले पुण्यात्मा तो विशिष्ट रूप से तीर्थंकर पद प्राप्ति हेतु अधिकारी बनते हैं। क्योंकि उन्होंने संसाररूप कुए में डूबते अनगिनत आत्माओं को हाथ का आलंबन देकर उबारा है।

 

तीर्थयात्रा के द्वारा तीर्थप्रभावना होती है और तीर्थप्रभावना से प्रभावक को तीर्थंकर पद की प्राप्ति होती है। श्राद्धदिनकृत्य में बताया है कि - श्रीकृष्णजी और श्रेणिक महाराजा जैसे पुण्यात्माओं ने तीर्थ की प्रभावना के द्वारा तीर्थंकर नामकर्म को प्राप्त किया था।

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