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जिनाज्ञा का सम्यक् पालन

तीर्थयात्रा का आयोजन करना यह शक्तिसंपन्न श्रावक के लिये जिनाज्ञा है। मोक्ष के लक्ष्य के साथ, विधि और जयणा के पालन पूर्वक तीर्थयात्रा का आयोजन करने से जिनाज्ञा का पालन होता है। सातों क्षेत्र संबंधी अनेक जिनाज्ञा का तीर्थयात्रा के साथ पालन संभव होता है।

 

तीर्थयात्रा के साथ जिनवचन-प्रवचन का श्रवण नियमित होता है। सद्गुरु के श्रीमुख से प्रतिदिन तीर्थमाहात्म्य और तीर्थयात्रा का आयोजन करने वाले संघपति व तीर्थयात्रा में जुड़ने वाले यात्रिक आदि के कर्त्तव्य पर विवेचन होता है। संसार के आरंभादि से निवृत्त होने पर मन स्थिर-शांत-स्वस्थ बना होने से जिनवाणी का असर अच्छा होता है। आत्मा को आनंद का लाभ होता है। जिनवाणी के नियमित श्रवण से आत्मा धीरे-धीरे मोक्षमार्ग की ओर सार्थक कदम बढ़ा कर गतिशील बनती है।

 

तीर्थयात्रा एक ऐसा सुनहरा अवसर है कि उसमें गुरुमुख से सुनी हुई अनेक जिनाज्ञाओं को साकार करने का अवसर मिलता है। धन की शक्ति से युक्त आत्मा तीर्थादि में धन का व्यय कर दानधर्म का लाभ ले सकती है। शरीर और मन की शक्तिवाली आत्मा निर्मल ब्रह्मचर्य का पालन कर शीलधर्म का लाभ प्राप्त कर सकती है। उसी तरह खाने-पीने की जंजाल से बचकर तपधर्म का आराधक बना जा सकता है। उसी प्रकार संसार के कार्यों से छूटकर प्रशस्त भावना में आत्मा भावित बनकर आनंद में झूम उठती है।

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