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शासन की उन्नति

तीर्थ याने जैनप्रवचन (द्वादशांगी), प्रभु द्वारा प्रस्थापित चतुर्विध संघ और प्रथम गणधर। तीर्थोन्नति याने तीर्थप्रभावना। तीर्थ का गौरव, तीर्थ की महिमा, तीर्थ का प्रभाव बढ़े वैसे कार्य करने। जिस तीर्थ की यात्रा करने जाय वो तीर्थ सभी के हृदय में चिरप्रतिष्ठित बन जाय ऐसे आयोजनों को तीर्थोन्नति कही जाती है। चतुर्विध श्रीसंघ का आदर-सत्कार-पूजन-गौरव के साथ तीर्थोन्नति का ऐसा अद्भूत माहौल खड़ा होता है कि देखने-सुनने वालों को लगे कि - 'धन्य जिन शासन! धन्य इनके देव-गुरु व धर्म! अहो! कितना महान!!'

 

इस तरह तीर्थ-संघ-जैनधर्म की प्रशंसा-अनुमोदना के उद्गार सहज आ जाते हैं... ऐसे आयोजनो को तीर्थोन्नति या तीर्थप्रभावना कही जाती है। जैनशासन की उन्नति करने वाले विशिष्ट प्रभावक विद्यमान न हो तब देव-गुरु के संबंधवाले सभी अनुष्ठान त्रिकरण की शुद्धि से और अनेक जीवों में धर्म के बीज बोने पर प्रभावक बनते हैं, ऐसा सम्यक्त्व सप्ततिकादि शास्त्रों में उल्लेख है। श्रावक जन भी तीर्थयात्रा, जिनमंदिर, जिनबिंब, प्रतिष्ठा, साधर्मिक वात्सल्य आदि विविध अनुष्ठानों के द्वारा तीर्थोन्नति कर प्रभावक बनते है, ऐसा आचारप्रदीप ग्रंथ में बताया है।

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