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जीर्ण चैत्य-उपाश्रयादि का उद्धार

तीर्थयात्रा के पवित्र उद्देश्य से निकला हुआ संघ अनेक गाँवों की स्पर्शना करते हुए अपने लक्ष्य स्थान की ओर आगे बढ़ता रहता है। मार्ग के प्रत्येक गाँवों में आने वाले जिनमंदिर, उपाश्रय, धर्मस्थान आदि की स्पर्शना करके प्रत्यक्ष परिस्थिति का अवलोकन करता है। सभी गाँव के संघ शक्तिमान नहीं होते हैं। अतः उन गाँव के जिनमंदिर आदि जीर्ण हुए हो तो उनके जीर्णोद्धार का लाभ संघजन प्राप्त कर सकते हैं।

 

संघवी स्वयं अपने द्रव्य से या संघ समूह रूप से लाभ ले सकते हैं। या संघ में देवद्रव्य के निधि में से भी जिनमंदिर का जीर्णोद्धार हो सकता है। पौषधशाला वगैरह का उद्धार भी संघ के सहयोग से पूर्ण हो सकता है। शास्त्रकारों ने नूतन जिनमंदिर के निर्माण से जीर्णोद्धार में आठ गुणा लाभ-फल बताया है।
पूर्वकाल में संघपति को जितना खर्च होता उतना या उससे अधिक खर्च साथ में आनेवाले श्रीमंतों का होता। संघ आयोजन का पुण्य संघपति का गिना जाता फिर भी खर्च करके लाभ लेने का पुण्य तो कोई भी साधर्मिक अर्जित कर सकता है।

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