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स्नेही-स्वजनों का हित

तीर्थयात्रा के द्वारा स्वजन-स्नेही-परिवार-कुटुंबीजनों का वास्तविक हित किया जा सकता है।

 

स्वजनादि को अर्थ-कामादि की सेवा में जोडना उसमें द्रव्यहित है, उसमें प्रायः भावहित नहीं है। वरन् वास्तविक एवं पारमार्थिक हित है। तीर्थयात्रा मोक्षमार्ग की साधना है और जीवों को मोक्षमार्ग की साधना में जोडने जैसा जगत में एक भी सच्चा हित नहीं है, ऐसा तत्त्वार्थसूत्र में वाचकवर श्री उमास्वातिजी महाराजा कहते है। तीर्थयात्रा के बहाने भी स्वजन साथ में जुडते हैं, लोकव्यवहारादि या लज्जादि से भी धर्मकार्य में प्रवृत्त होते हैं, उसके कारण पापकार्य से विराम लेते हैं, साधु का सत्संग-समागम प्राप्त होता है, आगे बढ़कर पूर्व के महापुरुषों के सिद्ध हस्त से अंजन किये गये विविध प्रतिमादि की पूजा आदि के द्वारा संघ के आराधक कर्म की लघुता को प्राप्त करते है। साथ ही सम्यग्दर्शनादि गुणों की स्पर्शना करते है और क्रमशः आगे बढ़कर मुक्तिमार्ग के आराधक-प्रभावक-रक्षक बन जाते हैं। इस प्रकार हित की परंपरा चलती है।

 

शादी आदि सांसारिक कार्यों में स्वजन-स्नेही जुड़ते हैं, उसमें सभी पाप का बंध करते है, जबकि धर्मकार्य में स्वजनों को जोड़ने से, जोड़ने वाले व जुड़ने वाले दोनों को अनेक आत्मिक लाभों की प्राप्ति होती है।

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