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सम्यग्दर्शन की निर्मलता

सम्यग्दर्शन जिनशासन का आधार है। आराधना-प्रभावना का प्राण है। सम्यग्दर्शन हो तो ही ज्ञान भी सम्यक् बनता है और चारित्र भी सम्यक् बनता है। सम्यग्दर्शन की महिमा का गान जैनशासन में पग-पग पर किया गया है। यह सम्यग्दर्शन ही सम्यक्त्व, दर्शन, समकित, सच्ची दृष्टि, श्रद्धा आदि के नाम से पहचाना जाता है। यह सम्यगदर्शन मन के निर्मल बनने से प्राप्त होता है। अतः सम्यग्दर्शन प्राप्त होने के बाद उसे निर्मल-शुद्ध-निरतिचार रखना अनिवार्य है।

 

तीर्थयात्रा सम्यग्दर्शन को निर्मल व दृढ़ बनाती है, ऐसा विधान श्री आचारांगनिर्युक्ति आदि ग्रंथों में किया गया है। एक भी जीव सम्यग्दर्शन को प्राप्त करें या फिर प्राप्त सम्यग्दर्शन को निर्मल करें यहीं तो संघयात्रा का मुख्य उद्देश्य और महान लाभ है।

 

और यूं भी... तीर्थयात्रा के आयोजन द्वारा सम्यग्दर्शन की शुद्धि सहज शक्य बनती है। क्योंकि सम्यग्दर्शन को निर्मल बनाने वाले आलंबनों में जिनबिंब, जिनमंदिर, जिनवाणी, सातक्षेत्रादि की भक्ति, तीर्थप्रभावना, अनुकंपादि दान आदि के प्रचुर प्रबल निमित्त संघयात्रा के साथ प्राप्त होते हैं।
इस जगत में सबसे बड़ा उपकार सम्यग्दर्शन का दान करना है। सम्यग्दर्शन को निर्मल बनाने हेतु जो आलंबन-साधन हो उसे पूर्ण रूप में सहयोग के रुप में प्रस्तुत करना-खड़ा करना। जिससे जीवों को सम्यक्त्व की प्राप्ति हो, निर्मल हो, शुद्ध हो। ऐसा प्रयास छ'री पालक संघ में किया जाता है और संघ का पूरा वातावरण भी सहज रूप से ऐसा ही मिल जाता है। अतः ज्ञानी हमें कहते हैं... तीर्थयात्रा का चौथा फल सम्यग्दर्शन की निर्मलता है।

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