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श्रेष्ठ संघवात्सल्य

संघयात्रा में चतुर्विध श्रीसंघ का पदार्पण होता है। इस जगत में श्रेष्ठ कुटुंब चतुर्विध श्रीसंघ ही है। चार गति में रहे जीवों का एक ही साथ उद्धार करने के लिये श्रीसंघ ने चार रूप धारण किये हैं, ऐसा हितोपदेश ग्रंथ में बताया है।

 

श्रीसंघ 25वाँ तीर्थंकर है। तीर्थंकर के बाद श्रीसंघ पूज्य है। तीर्थंकर भी देशना के प्रारंभ में श्रीसंघ को नमस्कार करते है। ऐसा श्रीसंघ जिनके गृहांगण में पदार्पण करता है वह वास्तव में कृतपुण्य है। जैसे कि.. उनके आँगण में अकाल में मेघवृष्टि हुई, उनके घर कल्पवृक्ष फला हो, उनके हाथ चिंतामणि गया हो, ऐसा शास्त्र में उल्लेख किया गया है। ऐसे श्रीसंघ की वात्सल्यभक्ति खूब करनी चाहिये। संघ की भक्ति तीर्थंकरपद की भेंट देती है। संघ जो-जो भी आराधना-प्रभावना-सुरक्षा का कार्य करता है उन सभी का लाभ उसकी भक्ति करनेवाले को अनायास ही मिल जाता है। प्रत्येक श्रावक को संघभक्ति करनी चाहिये। किन्तु सामान्य संयोग में जो संघभक्ति होती है उसमें सीमित देश-प्रदेश या संख्या में ही लाभ मिल सकता है। जबकि तीर्थयात्रा के प्रसंग पर तो विविध देश, शहर व गाँवों से बड़ी संख्या में सभी तरह की आराधना से परिपूर्ण साधर्मिकों का योग मिलने से अत्यंत उमंग-उल्लास के साथ भावपूर्वक संघवात्सल्य हो सकता है। इसे हमारे पूर्वमहर्षियों ने श्रेष्ठ संघवात्सल्य कहा है।

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