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धन की सफलता

पुण्यानुबंधी पुण्य से प्राप्त संपत्ति-धन का सद्व्यय याने धन की सफलता। संसारी आत्मा द्रव्य याने धन को धारण करती है।

 

संघयात्रा करने व करवाने से द्रव्य-धन सफल बनता है। सातों सात क्षेत्रों की सुंदर भक्ति संघयात्रा के साथ होती है। एवं सात क्षेत्र की भक्ति में द्रव्य-विनियोग हो उसके जैसा दूसरा कोई श्रेष्ठ उपयोग नहीं। इस सात क्षेत्रों के साथ तीर्थयात्रा के आयोजन में जितना द्रव्य-धन का सद्व्यय होता है उतना ही सफल है। बाकी सब (अर्थ-काम में उपयुक्त धन) निष्फल है।
तीर्थयात्रा के साथ गाँव-गाँव के मंदिर, तीर्थ वगैरह में धन का सद्व्यय होता है। चढावा आदि के द्वारा भी धन का उपयोग होता है।

 

यह द्रव्य-धन की सफलता है। जिस प्रकार आरंभ से दुर्गति की प्राप्ति होती है, उसी प्रकार परिग्रह भी दुर्गति का कारण है। महापरिग्रह नरक का द्वार है। संघयात्रा में धन का सद्व्यय करने में परिग्रह और परिग्रह की ममता कम होती है। धन का सत्क्षेत्र में विनियोग होने से सत्क्षेत्र परिपुष्ट बनते हैं। पुण्यानुबंधी पुण्य का अपूर्व सर्जन होता है। दानादि प्रकरण ग्रंथ में कहा है कि - 'संघ में उपयुक्त धन अनंत-अक्षय बन जाता है। जैसे समुद्र में प्रक्षिप्त जल अक्षय बनता है।' बस! तीर्थयात्रा में इस तरह धन की सफलता होती है।

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