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परमपद-मोक्ष की प्राप्ति न हो तब तक इन्द्र-राजा-महाराजा पद की प्राप्ति

जिससे मोक्षफल की प्राप्ति होती हो, उससे दूसरा क्या नहीं मिल सकता? देवताई-मानवीय सुख की प्राप्ति हेतु तीर्थयात्रा करो ऐसा शास्त्रकार महर्षि नहीं फरमाते है। क्योंकि ये सब तो आनुषांगिक फल है, मुख्य फल तो मोक्ष है। अतः मोक्षसुख की प्राप्ति के लक्ष्य के साथ तीर्थयात्रा करते-करते पुण्यानुबंधी पुण्य के योग से ऐसे सुख मिल भी जाय तो भी वें सुख आत्मा को नुकसान नहीं करते। शक्कर पर बैठी हुई मक्खी की तरह वो जीव आनुषांगिक फल के रूप में प्राप्त सुख का आस्वाद लेते सद्गुरु की प्रेरणा को पाकर वो सुख का त्याग कर देते हैं। संयम पथ को स्वीकार कर शीघ्र मुक्ति को प्राप्त करते हैं।

 

संघयात्रा-तीर्थयात्रा में जुड़ने वाले पुण्यात्मा को तीर्थयात्रा के प्रभाव से ऐसे-ऐसे उत्तम फलों की प्राप्ति होती है।

 

कर्पूरप्रकर और उपदेशसार आदि ग्रंथों में तीर्थयात्रा से शुभध्यान की प्राप्ति होती है ऐसा बताया है। आर्तध्यान और रौद्रध्यान के सभी निमित्त संसारयात्रा में रहे हुए हैं। उसका तीर्थयात्रा के कारण त्याग होता है और धर्मध्यानादि के पूरे आलंबन यहाँ मिलते है। अतः ऐसे आत्मा को शुभध्यान में आना सहज बन जाता है।

 

इस तरह छ'री पालक तीर्थयात्रा संघ के 11 लाभ शास्त्रों में वर्णित हैं।

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