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परमपद मोक्ष का सामीप्य

तीर्थयात्राकारक और यात्रिक को मुक्ति करतलगत बन जाती है।

 

तीर्थयात्रा का अंतिम लक्ष्य मोक्ष ही है। मोक्ष प्राप्ति हेतु तीर्थंकरभगवंतों ने धर्मतीर्थ की स्थापना की है। धन से छूटने दानधर्म, काम-भोग से छूटने शीलधर्म, खाने-पीने से छूटना, तपधर्म और संसार के भावों से छूटना भावधर्म है। इस तरह संसार में रहकर किये जाने वाले दान, शील, तप और भावधर्म यह आंशिक-मोक्षप्राप्ति है। इस प्रकार आंशिक मोक्ष की प्राप्ति करते-करते ही संसारत्याग होकर सर्वविरति की शुद्ध आराधना करते अंत में पूर्ण मोक्ष प्राप्त होता है। विषय और कषाय जब पूर्णरूप से नाश होते है, कर्म के बंधन पूरे छूट जाते हैं, राग-द्वेषादि का सर्वथा क्षय हो तब आत्मा मुक्ति को प्राप्त करती है। तीर्थयात्रा में आयोजित सभी अनुष्ठान इसीलिये ही होते हैं। वाह-वाह, नामना-कीर्ति, प्रशंसा-बहुमान, इहलोक-परलोक के सुख आदि प्राप्त करने हेतु तीर्थयात्रा होती नहीं, इसके लिये प्रभु की आज्ञा भी नहीं है। तीर्थ यात्रा का अनुष्ठान आयोजित करने का उसी आत्मा को मन होता है कि जो आसन्नभव्य हो, निकट में ही मोक्षगामी हो, सच्चे भाव से तीर्थयात्रा का आयोजन करने वाले एक भव में मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा काल न हो तो तीन, पांच या आठ भव में अवश्य मोक्ष को प्राप्त होता है।

 

श्री पुंडरीक गणधर ने प्रभु श्री ऋषभदेव परमात्मा की आज्ञा को पाकर श्री शत्रुंजय गिरिराज की ऐसी तीर्थयात्रा की इससे उनका तो मोक्ष हुआ ही उनके साथ जुड़े हुये पाँच करोड पुण्यात्माओं को भी मोक्ष हुआ। भावपूर्ण आयोजित तीर्थयात्रा इस प्रकार स्व-पर के मोक्ष को समीप ला देती है।

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